प्राचीन इतिहास के संपूर्ण नोट्स | Ancient India History Notes
प्राचीन भारतीय इतिहास के संपूर्ण नोट्स पढ़ें। इसमें सिंधु घाटी सभ्यता, वैदिक काल, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, मौर्य साम्राज्य, गुप्त साम्राज्य और प्राचीन भारत के अन्य महत्वपूर्ण इतिहास विषय शामिल हैं।
TABLE OF CONTENTS
भारत का प्राचीन इतिहास
इतिहास को समझने के लिए युगों का वर्गीकरण
- 1. प्रागैतिहासिक युग: यह वह दौर था जब मानव को लिपि या किसी भी लेखन कला का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था। मानव की उत्पत्ति से लेकर तकरीबन 3000 ईसा पूर्व तक का समय इसी के दायरे में आता है। इसके अंतर्गत पाषाण काल और ताम्र पाषाण काल का विस्तृत अध्ययन किया जाता है।
- 2. आद्य-ऐतिहासिक युग: इस युग में लोग किसी न किसी तरह की लिपि का प्रयोग तो करते थे, परंतु उस लिपि को आज तक पढ़ा नहीं जा सका है। हड़प्पा (सिंधु घाटी) सभ्यता और वैदिक सभ्यता को इसी श्रेणी में रखा गया है।
- 3. ऐतिहासिक युग: यह वह कालखंड है जब मानव को लिखने-पढ़ने का ज्ञान था और उन लिपियों को सफलतापूर्वक पढ़ा भी जा चुका है। आसान शब्दों में, जिन मानवीय गतिविधियों का लिखित और स्पष्ट प्रमाण मौजूद है, वही असल इतिहास है। इसकी शुरुआत 5वीं सदी ईसा पूर्व से लेकर वर्तमान समय तक मानी जाती है।
प्रागैतिहासिक युग एवं पाषाण काल
- भारत के अंदर पाषाणकालीन सभ्यता की खोज सबसे पहले 1863 ईस्वी में हुई थी।
- मशहूर भू-वैज्ञानिक रॉबर्ट ब्रूस फुट ने मद्रास के निकट पल्लवरम से पहला पुरा-पाषाणकालीन औजार खोज निकाला था।
- अध्ययन को सरल बनाने के लिए पाषाण युग को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है:
- पुरा पाषाण काल (5 लाख ई.पू. से 10 हजार ई.पू.)
- मध्य पाषाण काल (10 हजार ई.पू. से 4 हजार ई.पू.)
- नवपाषाण काल (7 हजार ई.पू. से 1 हजार ई.पू.)
पुरा पाषाण काल के तीन चरण:
1. निम्न पुरा पाषाण काल
- इस युग में इंसानों का जीवन अस्थिर (घुमक्कड़) था और वे मुख्य रूप से शिकार करके अपना भोजन जुटाते थे।
- उनके प्रमुख हथियारों में हैंड ऐक्स (कुल्हाड़ी), चॉपर-चॉपिंग और पेबुल उपकरण शामिल थे।
- भारत में इस संस्कृति को मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित किया गया है:
(क) चॉपर-चॉपिंग पेबुल संस्कृति: यह संस्कृति सबसे पहले पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में सोहन नदी घाटी में प्रकाश में आई। इसी वजह से इसे सोहन संस्कृति या सोहन उद्योग भी कहा जाता है। (ख) हैंड ऐक्स संस्कृति: इसका सबसे प्रमुख औजार हैंड ऐक्स था और इसे एश्यूलियन संस्कृति भी कहते हैं। इसके औजार पहली बार मद्रास के पास अतिरमपक्कम से मिले थे, इसलिए इसे मद्रासी संस्कृति भी पुकारा जाता है।
2. मध्य पुरापाषाण काल
- इस समय के दौरान पत्थर के फलकों (flakes) का उपयोग करके औजार बनाए जाने लगे।
- इसी विशेषता के कारण इसे फलक संस्कृति भी कहा जाता है।
- प्रमुख उपकरणों में स्क्रेपर (खुरचनी), बेधक, बेधनियां आदि शामिल थे।
- गंगा घाटी, असम, सिक्किम और केरल को छोड़कर यह संस्कृति लगभग पूरे भारत में फैली हुई थी।
- इसी काल में मानव ने पहली बार पशुपालन की शुरुआत की।
- पशुपालन के सबसे पुराने साक्ष्य मध्य प्रदेश के आदमगढ़ और राजस्थान के बागोर से मिले हैं, जिनका समय करीब 5000 ई.पू. माना जाता है।
- सबसे प्राचीन ज्ञात मध्य पाषाण कालीन स्थल सराय नाहर राय और महदहा (प्रतापगढ़) हैं।
- पत्थर के औजारों में तीर की नोक का निर्माण इस युग की सबसे बड़ी खासियत थी, जिन्हें माइक्रोलिथ (सूक्ष्म पाषाण उपकरण) कहा गया।
- इसी कालखंड में इतिहास में सबसे पहले मानव कंकालों के साक्ष्य प्राप्त होते हैं।
3. उच्च पुरापाषाण काल
- इस काल की सबसे बड़ी घटना आधुनिक मानव यानि होमोसेपियंस (ज्ञानी मानव) का उदय था।
- प्रमुख हथियारों में तहनी, चाकू, स्क्रेपर आदि थे, जिनमें तहनी (Blade) सबसे विशिष्ट उपकरण थी।
- इलाहाबाद (प्रयागराज) की बेलन घाटी के लोहंदा से हड्डी से निर्मित नारी की मूर्ति प्राप्त हुई है।
- इंसानों ने पहली बार रहने के लिए गुफाओं का इस्तेमाल करना शुरू किया।
- मध्य प्रदेश की भीमबेटका की पहाड़ियों में ऐसी प्राचीन गुफाएं मिली हैं जिनका प्रयोग आवास के लिए होता था।
- इसी समय मनुष्य ने चित्रकारी की कला विकसित की। भीमबेटका की गुफाओं में इस युग के बने प्राचीन चित्र मौजूद हैं।
मध्य पाषाण काल
- यह समय पुरापाषाण काल और नव पाषाण काल के बीच का संक्रमण काल (Transitional Period) था। वास्तव में यह नव पाषाण युग की नींव था।
- जलवायु गर्म होने लगी और बर्फ की जगह विशाल घास के मैदान विकसित होने लगे।
- खान-पान के लिए बर्तनों की आवश्यकता महसूस हुई, जिसके चलते कुम्भकारी (मिट्टी के बर्तन बनाना) सबसे पहले इसी काल में नजर आई।
- कश्मीर में विकसित हुई संस्कृति को कश्मीरी नवपाषाण संस्कृति का नाम दिया गया।
- बुर्जहोम संस्कृति के लोग जमीन के अंदर गर्तवास (गड्ढे वाले घरों) में रहा करते थे।
- बुर्जहोम से ही इंसान के साथ कुत्ते को दफनाए जाने के ऐतिहासिक साक्ष्य मिले हैं।
कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
- रॉबर्ट ब्रूस फुट, जिन्होंने पाषाणकालीन सभ्यता को खोजा, वह पेशे से एक भू-वैज्ञानिक थे।
- मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी के हथनौर से मानव खोपड़ी का जीवाश्म मिला है, जो भारत का सबसे प्राचीन जीवाश्म है।
- चोपानी मांडो (बेलन घाटी) से दुनिया के सबसे प्राचीन मृद्भांड (मिट्टी के बर्तन) प्राप्त हुए हैं।
ताम्र-पाषाण काल (Chalcolithic Age)
- जब इंसानों ने पत्थर के हथियारों के साथ-साथ तांबे (Copper) के औजारों का भी इस्तेमाल शुरू कर दिया, तो उस युग को ताम्र-पाषाण काल कहा गया। इसे कैल्कोलिशिक युग भी कहते हैं।
पूर्व सैंधव ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियाँ:
- 1. क्वेटा संस्कृति: बलूचिस्तान में मिली, जहाँ पांडुरंग (हल्के पीले) बर्तनों का इस्तेमाल होता था।
- 2. कुल्ली संस्कृति: बलूचिस्तान में ही, पांडुरंग के लेप पर काले रंग से चित्रकारी वाले बर्तन।
- 3. नाल-आर्मा संस्कृति: बलूचिस्तान और सिंध में, पांडुरंग पर रंग-बिरंगी चित्रकारी वाले मृद्भांड।
- 4. झोब संस्कृति: बलूचिस्तान में, लाल रंग के लेप पर काले रंग से सजाए गए बर्तन।
- 5. कोटदीजी संस्कृति: सिंध क्षेत्र में, लाल लेप पर सफेद/दुधिया पट्टी और रंग-बिरंगे डिजाइन वाले बर्तन।
- 6. पूर्व हड़प्पा संस्कृति: पाकिस्तान के पंजाब में, लाल या बैंगनी रंग के लेप पर काले रंग की धारियों वाले बर्तन।
ताम्र-पाषाण काल के प्रमुख तथ्य:
- सबसे ज्यादा पूर्व सैंधव ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियां बलूचिस्तान से प्राप्त हुई हैं।
- अहाड़ का पुराना नाम 'ताम्रवती' (तांबे वाली जगह) मिलता है।
- गैरिक मृद्भांड पात्रों का नामकरण हस्तिनापुर से मिले बर्तनों के आधार पर किया गया है।
नव पाषाण काल (Neolithic Age)
- समय के हिसाब से यह युग भले ही छोटा रहा हो, लेकिन मानव इतिहास के सबसे बड़े और क्रांतिकारी बदलाव इसी काल में हुए।
- वैश्विक स्तर पर इसकी शुरुआत 9000 ईसा पूर्व में पश्चिमी एशिया से मानी जाती है।
- इसी क्षेत्र के लोगों ने दुनिया को जौ, गेहूँ, दलहन और तिलहन जैसी अहम फसलें (खाद्यान्न) प्रदान कीं।
- यहाँ की सबसे प्राचीन बस्ती मेहरगढ़ (पाकिस्तान) है। कृषि (खेती) का सबसे पहला और स्पष्ट प्रमाण यहीं से मिला है, जहाँ 7000 ई.पू. में खेती शुरू हो गई थी।
- भारत में कोलडिहवा से चावल (धान) उगाने के सबसे पुराने साक्ष्य मिले हैं, जो लगभग 5000 ई.पू. के माने जाते हैं।
- इस युग में आकर लोग स्थायी रूप से बसने लगे, खेती से पूरी तरह परिचित हो गए और जानवरों को पालने लगे।
हड़प्पा सभ्यता (Harappa Civilization)
- हड़प्पा सभ्यता एक अत्यंत उन्नत कांस्य युगीन नगरीय संस्कृति थी। इसमें तांबे से भी ज्यादा मजबूत कांसे के हथियारों का इस्तेमाल, लिपि (लिखने की कला) की जानकारी और सुनियोजित शहरों में निवास करना इस महान सभ्यता के प्रमुख लक्षण माने जाते हैं।
सभ्यता का नामकरण
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- भारतीय उपमहाद्वीप में पनपी इस प्राचीन सभ्यता को कई नामों से पुकारा जाता है, जैसे- सिंधु घाटी सभ्यता, सैंधव सभ्यता, सिंधु सभ्यता और हड़प्पा सभ्यता।
- सबसे पहले रावी नदी के किनारे 'हड़प्पा' नामक स्थान की खोज की गई थी।
- शुरुआती दौर में जो भी जगहें खोजी गईं (जैसे मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो, आम्बी, कोटदीजी, अलीमुराद), वे सभी मुख्य रूप से सिंधु नदी के किनारे ही मिली थीं। इसी कारण पुरातत्वविदों ने प्रारंभ में इसे 'सिंधु घाटी की सभ्यता' का नाम दे दिया था।
- लेकिन समय बीतने के साथ इस सभ्यता के निशान सिंधु नदी के बाहर भी मिलने लगे, जैसे- सरस्वती, यमुना और गोदावरी नदी घाटियों में।
- इस वजह से 'सिंधु घाटी' नाम उपयुक्त नहीं रहा क्योंकि यह सिर्फ एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र को दर्शाता था। अतः इतिहास की परंपरा को ध्यान में रखते हुए, खोजे गए पहले स्थल के आधार पर इसका नाम 'हड़प्पा सभ्यता' रख दिया गया। यह नाम बिल्कुल सटीक है क्योंकि यह किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
सीमा निर्धारण एवं क्षेत्र विस्तार
- हड़प्पा सभ्यता का फैलाव भारतीय उपमहाद्वीप के तीन देशों— भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में देखने को मिलता है।
- इसके सबसे ज्यादा पुरास्थल भारत में ही मिले हैं। इसका पश्चिमी छोर पाकिस्तान के बलूचिस्तान (सुत्कागेंडोर) से लेकर पूर्वी छोर उत्तर प्रदेश के मेरठ (आलमगीरपुर) तक फैला है, जिसकी कुल लंबाई करीब 1600 किलोमीटर है।
- वहीं उत्तर में जम्मू-कश्मीर (मांडा) से लेकर दक्षिण में महाराष्ट्र (दाईमाबाद) तक इसकी लंबाई लगभग 1400 किलोमीटर है।
- इस पूरी सभ्यता का कुल क्षेत्रफल 16 लाख वर्ग किलोमीटर के आसपास है।
- भारत में यह सभ्यता पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर तक विस्तृत थी। पाकिस्तान में यह पश्चिमी पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान में, तथा कुछ हिस्सा अफगानिस्तान में फैला था।
- सबसे ज्यादा प्राचीन स्थल सरस्वती नदी की घाटी में पाए गए हैं। अगर किसी एक राज्य की बात करें, तो गुजरात से सर्वाधिक स्थल मिले हैं। इस सभ्यता के पास लगभग 1300 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा भी थी।
- नोट: सिंधु सभ्यता के प्रमुख स्थलों की भौगोलिक स्थिति को चार्ट के माध्यम से समझा जा सकता है।
नगर नियोजन (Town Planning)
सामान्य विशेषतायें:
- सिंधु सभ्यता के शहर दुनिया के सबसे पुराने और सुनियोजित (well-planned) नगर माने जाते हैं। इन्हें देखकर लगता है मानो किसी विशेष संस्था या प्रशासन की देखरेख में पूरा शहर बसाया गया हो।
- यहाँ की सड़कें बिल्कुल सीधी होती थीं और एक-दूसरे को समकोण (90 डिग्री) पर काटती थीं, जिससे पूरा शहर वर्गाकार या आयताकार हिस्सों (ग्रिड) में बंट जाता था।
- सबसे चौड़ी सड़क मोहनजोदड़ो से मिली है, जो करीब 10 मीटर चौड़ी थी। इतिहासकारों ने इसे 'राजपथ' या 'प्रथम सड़क' का नाम दिया है।
- आम तौर पर घरों के अंदर 4 से 5 कमरे होते थे। घरों में आंगन, रसोईघर, नहाने का स्थान (स्नानागार), कुएं और बड़े मकानों में शौचालय भी मौजूद होते थे।
- घरों के मुख्य दरवाजे सड़क की तरफ न खुलकर पीछे की संकरी गलियों में खुला करते थे।
- हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के घरों को बनाने में पक्की ईंटों का खूब इस्तेमाल हुआ है, जबकि बाकी जगहों पर ज्यादातर कच्ची ईंटें ही लगाई गई थीं।
- केवल कालीबंगा ही एक ऐसी जगह है जहाँ से सजावटी (अलंकृत) ईंटों के प्रमाण मिले हैं।
- ईंटों का सामान्य आकार 10" × 5" × 2.5" इंच होता था, जिनका अनुपात 4 : 2 : 1 था।
प्रमुख नगरों की विशेषताएँ
हड़प्पा:
- हड़प्पा शहर मुख्य रूप से दो हिस्सों में बंटा हुआ था— पश्चिमी भाग में 'दुर्ग' (किला क्षेत्र) और पूर्वी भाग में 'निचला नगर' (आम जनता के लिए)।
- पश्चिमी दुर्ग के बाहर उत्तर दिशा में एक टीले की खुदाई से कुछ बेहद खास चीजें मिली हैं, जैसे:
- श्रमिक बस्ती: मजदूरों के रहने के लिए बनाई गई जगह, जहाँ से कुल 15 मकान मिले हैं।
- तांबा गलाने का कारखाना: इसी बस्ती के पास 16 भट्टियां मिली हैं, जिनमें राख और कोयले के अंश हैं। पुरातत्वविदों का मानना है कि यहाँ तांबा पिघलाया जाता था।
- अनाज पीसने के चबूतरे: यहीं से पक्की ईंटों से बने 18 गोल चबूतरे भी मिले हैं, जिनके बीच में एक गड्ढा है। इन गड्ढों से जौ, गेहूं और राख के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
मोहनजोदड़ो
- मोहनजोदड़ो शहर मुख्य रूप से दो हिस्सों में बंटा हुआ था— पश्चिमी हिस्से में दुर्ग (किला) और पूर्वी हिस्से में निचला नगर।
- दुर्ग वाले इलाके से कई महत्वपूर्ण सार्वजनिक इमारतें मिली हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
- विशाल स्नानागार (Great Bath): पक्की ईंटों से बनी यह इमारत सिंधु सभ्यता की सबसे आकर्षक और सुंदर संरचना मानी जाती है। इसका कुल आकार 180 फीट लंबा और 108 फीट चौड़ा है।
- इसके बीचों-बीच एक तालाब है, जिसकी लंबाई 11.89 मीटर, चौड़ाई 7.01 मीटर और गहराई 2.43 मीटर है।
- पानी तक पहुँचने के लिए तालाब की उत्तर और दक्षिण दिशा में सीढ़ियाँ बनाई गई थीं।
- गंदे पानी की निकासी के लिए तालाब के दक्षिण-पश्चिम कोने में एक नाली की व्यवस्था भी थी।
- विशाल अन्नागार (Great Granary): यह अनाज गोदाम 45.71 मीटर लंबा और 22.86 मीटर चौड़ा है।
- इसके उत्तर में एक चबूतरा मौजूद है और इसमें कुल 27 कमरे (प्रकोष्ठ) बने हैं। यह सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा अन्नागार है।
- पुरोहित आवास: विशाल स्नानागार के करीब ही एक बहुत बड़ी इमारत (70.1 मीटर × 23.77 मीटर) के अवशेष मिले हैं, जिसे पुरोहितों का निवास स्थान माना जाता है।
- विशाल स्नानागार (Great Bath): पक्की ईंटों से बनी यह इमारत सिंधु सभ्यता की सबसे आकर्षक और सुंदर संरचना मानी जाती है। इसका कुल आकार 180 फीट लंबा और 108 फीट चौड़ा है।
चन्हूदड़ो
- यहाँ से एक सामान्य नगर के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- वक्राकार (घुमावदार) ईंटों के इस्तेमाल का प्रमाण भी यहीं से मिलता है।
- यहाँ मनके और गुरिया बनाने के कारखाने के साक्ष्य मिले हैं।
लोथल
- लोथल को 'लघु हड़प्पा' या 'लघु मोहनजोदड़ो' के नाम से भी जाना जाता है।
- यह भी दो हिस्सों (पश्चिमी दुर्ग और पूर्वी निचला नगर) में बंटा था, लेकिन दोनों हिस्से एक ही रक्षा दीवार (प्राचीर) से घिरे हुए थे।
- यहाँ से भी मनके बनाने का कारखाना और कपड़े रंगने का एक रंगाई कुंड प्राप्त हुआ है।
- अन्य शहरों के विपरीत, लोथल में घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर ही खुलते थे।
- निचले नगर के पूर्व में एक पक्की ईंटों से बना गोदीवाड़ा (Dockyard / बंदरगाह) मिला है। इसका आकार 218 मीटर लंबा, 36 मीटर चौड़ा और 3.3 मीटर गहरा है।
धौलावीरा
- यह भारत में मौजूद सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा नगर है।
- इस शहर की बसावट और योजना अन्य सिंधु शहरों से बिल्कुल अलग थी।
- यहाँ से पानी जमा करने के 16 जलाशयों (Water Reservoirs) के साक्ष्य मिले हैं। साथ ही एक विशाल स्टेडियम और सूचना पट्ट (Signboard) भी प्राप्त हुआ है।
कालीबंगा
- यह भी दुर्ग और निचले नगर में विभाजित था, लेकिन यहाँ से सिंधु सभ्यता के नीचे एक और पुरानी (पूर्व सैंधव) संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं।
- दुर्ग और निचला नगर, दोनों अलग-अलग रक्षा दीवारों से सुरक्षित थे। एक जगह के फर्श पर सजावटी (अलंकृत) ईंटों का प्रयोग हुआ है।
- यहाँ से आयताकार हवन कुंड (अग्निवेदिकाएँ) भी मिली हैं।
बनावली
- यहाँ दुर्ग और निचला नगर अलग-अलग नहीं थे, बल्कि एक साथ जुड़े हुए थे।
- यहाँ से मिट्टी का बना हुआ एक खिलौना हल और अग्निवेदिकाएँ (हवन कुंड) प्राप्त हुई हैं।
सामाजिक जीवन
- सिंधु सभ्यता का समाज मातृसत्तात्मक (Matriarchal) स्वरूप का था, जहाँ महिलाओं की प्रमुख भूमिका होती थी।
- समाज कई वर्गों में विभाजित था, जिसे मुख्य रूप से चार भागों में देखा जा सकता है:
- विद्वान वर्ग: पुजारी, वैद्य (डॉक्टर), शिक्षक और ज्योतिषी।
- योद्धा वर्ग: सुरक्षा करने वाले।
- व्यापारी और शिल्पी वर्ग: व्यापार और कला-कौशल करने वाले। समाज में इनका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा।
- श्रमिक वर्ग: मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग।
खान-पान एवं रहन-सहन
- भोजन: लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह का भोजन ग्रहण करते थे, जिसमें दूध, मांस और मछली शामिल थे। दवाई के रूप में नींबू, शिलाजीत और समुद्र के फेन का इस्तेमाल होता था।
- पहनावा (वस्त्र): सूती और ऊनी दोनों प्रकार के कपड़ों का प्रचलन था। हालाँकि कपड़ों के भौतिक साक्ष्य नहीं मिले हैं, लेकिन मोहनजोदड़ो से चांदी की एक डिब्बी में लाल रंग के कपड़े के अंश जरूर मिले हैं। महिलाएँ स्कर्ट जैसे कपड़े पहनती थीं और ऊपर से शॉल ओढ़ने का भी रिवाज था।
- गहने (आभूषण): लोग सोने, चांदी, तांबे, कांसे, कीमती और साधारण पत्थरों, यहाँ तक कि मिट्टी और हाथीदांत से बने आभूषण पहनते थे। हड़प्पा से छह लड़ियों वाला सोने का हार भी मिला है। मुख्य आभूषणों में अंगूठी, चूड़ियाँ, बाजूबंद और हेयरपिन शामिल थे।
- श्रृंगार (सौन्दर्य प्रसाधन): हड़प्पा के लोग सजने-संवरने के शौकीन थे। खुदाई में मेकअप बॉक्स, काजल की डिब्बी, और सफेद पाउडर मिला है। चन्हूदड़ो से तो लिपस्टिक के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं। महिलाएँ अलग-अलग तरह से अपने बाल संवारती थीं।
अंतिम संस्कार (शवाधान प्रणाली)
- मृतकों के अंतिम संस्कार की तीन मुख्य विधियाँ थीं:
- पूर्ण शवाधान: शव को सीधे कब्र में दफनाना (यह सबसे अधिक प्रचलित तरीका था)।
- आंशिक शवाधान: शव को खुले में छोड़ देना और पशु-पक्षियों के खाने के बाद बची हुई हड्डियों को दफनाना।
- दाह संस्कार: शव को आग में जलाना।
- आमतौर पर शवों को इस तरह दफनाया जाता था कि सिर उत्तर दिशा में और पैर दक्षिण दिशा में हों। शव के साथ गहने और मिट्टी के बर्तन जैसी जरूरत की चीजें भी रखी जाती थीं। सिर की तरफ कब्र ज्यादा चौड़ी होती थी।
- हड़प्पा के दुर्ग के दक्षिण में एक कब्रिस्तान मिला है जिसे विद्वानों ने 'R-37' नाम दिया है। यहाँ से कुल 37 कब्रें मिली हैं। एक खास कब्र में शव को लकड़ी के ताबूत में रखा गया था, जो सुमेरियन सभ्यता से मिलती-जुलती परंपरा है।
- लोथल के उत्तर-पश्चिम में 20 कब्रें मिली हैं, जिनमें से कुछ 'युगल शवाधान' (जोड़े में दफनाए गए) के उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
- दिलचस्प बात यह है कि मोहनजोदड़ो से अब तक कोई कब्रिस्तान नहीं मिला है।
धार्मिक जीवन
- हड़प्पा के लोग अपने देवी-देवताओं को कई रूपों में पूजते थे:
- पुरुष देवता (पशुपतिनाथ): मोहनजोदड़ो से मिली एक मुहर (Seal) पर तीन मुख वाले और सींग धारण किए हुए एक पुरुष देवता को ध्यान की मुद्रा (योग मुद्रा) में बैठा दिखाया गया है।
- उनके दाईं तरफ हाथी और बाघ हैं, बाईं तरफ गैंडा और भैंसा है, और पैरों के पास दो हिरण बैठे हैं।
- इतिहासकार जॉन मार्शल ने इसे भगवान शिव का सबसे प्राचीन रूप (आदि शिव) माना है। हड़प्पा से मिली एक अन्य मुहर पर भी त्रिशूल के पास खड़े बैल और मचान पर बैठे एक पुरुष की आकृति से शिव पूजा के संकेत मिलते हैं।
- मातृदेवी की पूजा: कई स्थानों से मिली महिलाओं की मिट्टी की मूर्तियों से स्पष्ट होता है कि वे मातृदेवी की उपासना करते थे।
- कुछ मूर्तियों के सिर पर दीपक जैसी आकृतियां हैं जिनमें कालिख लगी है, जिससे पता चलता है कि इनमें तेल डालकर पूजा की जाती थी।
- इतिहासकारों के अनुसार, उनके धर्म में मातृदेवी का स्थान सबसे ऊँचा था। हड़प्पा की एक मुहर में तो एक स्त्री के गर्भ से पौधा निकलते हुए दिखाया गया है, जो पृथ्वी (उर्वरता की देवी) का प्रतीक है। हालांकि पूरी सभ्यता में कहीं भी मंदिर होने के सबूत नहीं मिले हैं।
- पशुओं की पूजा: वे असली जानवरों के साथ-साथ काल्पनिक जानवरों (जैसे तीन सिर वाला पशु या जुड़े हुए शरीर वाले बाघ) की भी देवता के रूप में पूजा करते थे।
- यज्ञ, अग्नि पूजा और अंधविश्वास:
- कालीबंगा, लोथल और बनावली से मिले हवन कुंडों (अग्निवेदिकाओं) से साफ होता है कि वे अग्नि पूजा और यज्ञ करते थे। इनमें मिली जानवरों की हड्डियों से पशु बलि देने की प्रथा का भी पता चलता है।
- सैंधव लोग पुनर्जन्म पर विश्वास करते थे और बुरी शक्तियों से बचने के लिए जादू-टोना, झाड़-फूंक और ताबीज का भी खूब इस्तेमाल करते थे।
आर्थिक जीवन (Economic Life)
- प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह जानना महत्वपूर्ण है कि सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से सिंचाई आधारित उन्नत कृषि, पशुपालन, अधिशेष (Surplus) उत्पादन, उत्कृष्ट दस्तकारी और वस्तु-विनिमय (Barter) आधारित व्यापार पर निर्भर थी।
1. पशुपालन (Animal Husbandry)
- हड़प्पावासी कृषि के साथ-साथ पशुपालन पर भी अत्यधिक निर्भर थे। उनके प्रमुख पालतू पशुओं में गाय, बैल, भैंस, भेड़ और बकरी शामिल थे।
- वे सूअर (जंगली और पालतू दोनों) तथा कुत्ते (जिनकी कई नस्लें मौजूद थीं) भी पालते थे। बोझा ढोने के लिए ऊंट और गधे (हड़प्पा से प्राप्त साक्ष्य) का प्रयोग किया जाता था।
- घोड़े के उपयोग को लेकर इतिहासकारों में बहस है, परंतु सुरकोटडा (गुजरात) के अंतिम चरण से घोड़े की अस्थियों (हड्डियों) के स्पष्ट साक्ष्य मिले हैं, जो यह प्रमाणित करते हैं कि वे घोड़े से भी परिचित थे।
- परीक्षाओं के लिए यह सबसे अहम तथ्य है कि उन्हें हाथी, बाघ, गैंडा, भालू (रीछ), बंदर, बिल्ली, बारहसिंगा और खरगोश जैसे वन्यजीवों का ज्ञान था, लेकिन शेर (Lion) का उन्हें बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था (किसी भी मुहर पर शेर का अंकन नहीं मिलता)।
2. कृषि (Agriculture)
- सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के कारण यहाँ की मिट्टी अत्यधिक उर्वरक (उपजाऊ) थी। किसान रबी की फसल की बुवाई बाढ़ का पानी उतरने के बाद (अक्टूबर-नवंबर) करते थे और मार्च-अप्रैल में फसल काट ली जाती थी।
- खेती के प्रमुख उपकरणों में लकड़ी के हल, कुदाल, हंसिया और कुल्हाड़ी शामिल थे। बनावली (हरियाणा) से मिट्टी का बना हुआ एक उत्कृष्ट खिलौना हल मिला है।
- कालीबंगा (राजस्थान) से जुते हुए खेत (प्राक्-सैंधव काल) और एक ही खेत में एक साथ दो फसलें (जैसे चना और सरसों) उगाने के ऐतिहासिक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
- सिंधुवासी मुख्य रूप से 9 फसलों का उत्पादन करते थे: गेहूं, जौ, चावल, बाजरा, राई, सरसों, तिल, मटर और कपास।
- गेहूं की दो प्रजातियाँ (ट्रिटिकम कम्पैक्टम - बड़े दाने, और ट्रिटिकम स्फीरोकोकम - छोटे दाने) उगाई जाती थीं। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से '6 धारियों वाले जौ', बनावली से 'सबसे उत्तम किस्म के जौ', और लोथल व रंगपुर से धान (चावल) की भूसी के प्रमाण मिले हैं।
- संपूर्ण विश्व में कपास (Cotton) का उत्पादन सबसे पहले सिंधु घाटी के लोगों ने ही शुरू किया था। इसी वजह से प्राचीन यूनानियों (Greeks) ने कपास को 'सिन्डोन' (Sindon) का नाम दिया, जिसका अर्थ है 'सिंधु क्षेत्र की उपज'।
3. उद्योग और विनिर्माण (Industry)
- अर्थव्यवस्था का सबसे प्रमुख आधार वस्त्र उद्योग (सूती एवं ऊनी) था। हर छोटे-बड़े मकान से कताई-बुनाई में इस्तेमाल होने वाले मिट्टी और शंख से बने दो-तीन छेद वाले तकुए (Spindles) मिले हैं। मोहनजोदड़ो वस्त्र निर्माण का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है।
- अन्य विकसित उद्योगों में धातु कर्म (Metalurgy), मनका निर्माण (Bead making), मूर्ति शिल्प, मृद्भांड (Pottery), हाथीदांत की नक्काशी और ईंट उद्योग प्रमुख थे।
4. व्यापार और कच्चे माल की प्राप्ति (Trade & Raw Materials)
- हड़प्पा के शहरों में उद्योग तो विकसित थे, लेकिन वहां स्थानीय स्तर पर कच्चा माल उपलब्ध नहीं था। इसलिए उन्होंने अफगानिस्तान, मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया तक अपनी व्यापारिक बस्तियां बसाईं।
- आयात किए जाने वाले प्रमुख कच्चे माल और उनके स्रोत:
- चांदी (Silver): अफगानिस्तान और ईरान (मुख्य रूप से अफगानिस्तान)
- सोना (Gold): कोलार की खान (कर्नाटक, दक्षिण भारत)
- तांबा (Copper): खेतड़ी की खदानें (राजस्थान) और ओमान से
- टिन और लाजवर्द (Lapis Lazuli): बदरख्शां (उत्तरी अफगानिस्तान)
- सेलखड़ी और चर्ट पत्थर: बलूचिस्तान और राजस्थान
- फिरोजा: खुरासान
- लाल रंग: होर्मुज (फारस की खाड़ी)
- देवदार की लकड़ी और शिलाजीत: हिमालय के पर्वतीय इलाकों से
5. विदेशी व्यापार, यातायात एवं मापतौल
- सिंधु वासियों के मेसोपोटामिया, मिस्र, क्रीट और फारस की खाड़ी के देशों के साथ अत्यंत प्रगाढ़ व्यापारिक संबंध थे।
- मेसोपोटामिया (सुमेरियन) के अभिलेखों में तीन प्रमुख व्यापारिक क्षेत्रों का स्पष्ट उल्लेख है: मेलुहह (सिंधु क्षेत्र), मगन (मकरान तट) और दिलमुन (बहरीन)। दिलमुन को व्यापार में 'बिचौलिए' (Middleman) के रूप में जाना जाता था। यहाँ से सूती कपड़े, हाथीदांत के उत्पाद और कार्नेलियन मनके निर्यात किए जाते थे।
- यातायात: स्थलीय मार्गों के लिए ठोस पहियों वाली बैलगाड़ी और मालवाहक पशुओं का प्रयोग होता था। जलमार्ग के लिए नावें और जहाज थे। लोथल से मिट्टी की बनी 5 नावों के मॉडल और एक बहुत बड़ा गोदीवाड़ा (Dockyard / बंदरगाह) मिला है। मोहनजोदड़ो के एक बर्तन पर भी नाव का चित्र उकेरा गया है।
- मापतौल (Weights & Measures): बाट मुख्य रूप से पत्थर के बने होते थे। घनाकार (Cubical) बाट सबसे अधिक लोकप्रिय थे। भारी बाट 16 के गुणक (Multiples of 16) में होते थे, जबकि छोटे बाट द्विआधारी (Binary / दुगना) प्रणाली पर आधारित थे। मोहनजोदड़ो से सीप का, हड़प्पा से तांबे का, लोथल से हाथीदांत का और कालीबंगा से मिट्टी का पैमाना (Scale) प्राप्त हुआ है।
सैंधव कला (Harappan Art & Craft)
1. मुहरें (Seals) और मनके (Beads)
- अब तक की खुदाई में 2500 से भी अधिक मुहरें प्राप्त हो चुकी हैं, जो मुख्य रूप से सेलखड़ी (Steatite) पत्थर से निर्मित हैं। तांबे की मुहरें केवल लोथल और देसलपुर से मिली हैं।
- ये मुहरें गोल, आयताकार और बेलनाकार होती थीं, लेकिन सबसे ज्यादा प्रचलन वर्गाकार मुहरों (2.8 सेमी) का था। लोथल से फारस की खाड़ी की शैली वाली गोल 'बटननुमा' मुहर भी मिली है।
- इन मुहरों पर सबसे ज्यादा एक सींग वाले काल्पनिक पशु (Unicorn) का चित्रांकन है। इसके अलावा कुबड़ वाला बैल, बाघ, भैंसा और गैंडा भी उकेरा गया है। सबसे सुंदर मुहर मोहनजोदड़ो से मिली 'त्रिमुखी देवता' (पशुपति शिव) की है।
- गहनों के रूप में बेलनाकार (Cylindrical) मनके सबसे ज्यादा पसंद किए जाते थे। चन्हूदड़ो और लोथल से मनके बनाने के विशाल कारखाने मिले हैं। हड़प्पा से 'हृदयाकार' (Heart-shaped) और मोहनजोदड़ो से 'तीन बंदरों' के अंकन वाला विशिष्ट मनका मिला है।
2. मृद्भांड (Pottery) और मूर्तिकला (Sculpture)
- बर्तन (मृद्भांड) मुख्य रूप से चाक पर नदी की चिकनी मिट्टी से बनाए जाते थे। इन बर्तनों पर लाल रंग का लेप लगाकर काले रंग से सुंदर चित्रकारी (पशु-पक्षी और ज्यामितीय आकार) की जाती थी।
- हड़प्पा के एक बर्तन पर मछुआरे का चित्र है। जबकि लोथल के एक बर्तन पर पेड़ पर बैठी चिड़िया (मुंह में मछली दबाए) और नीचे खड़ी लोमड़ी का चित्र है, जो स्पष्ट रूप से पंचतंत्र की 'चालाक लोमड़ी' की कहानी को दर्शाता है।
- धातु की मूर्तियां: मोहनजोदड़ो से कांसे की बनी 14 सेमी ऊंची 'नर्तकी की मूर्ति' (Dancing Girl) मिली है, जो लॉस्ट-वैक्स (द्ववीमोम) तकनीक की अद्भुत मिसाल है। इसे आद्य-ऑस्ट्रेलायड प्रजाति का माना गया है।
- पत्थर की मूर्तियां: मोहनजोदड़ो से सेलखड़ी पत्थर से बनी 'तिपतिया शॉल ओढ़े हुए योगी/पुरोहित' (Priest King) की प्रतिमा अत्यधिक प्रसिद्ध है।
- मृण्मूर्तियां (Terracotta): पक्की मिट्टी की मूर्तियां सबसे अधिक संख्या में (हस्तनिर्मित) मिली हैं। इनमें जानवरों (बिना कुबड़ वाले बैल) की मूर्तियां इंसानों से अधिक हैं। मानव मूर्तियों में स्त्रियों (स्कर्ट पहने हुए) की मूर्तियां पुरुषों से कहीं ज्यादा मिली हैं, जो समाज के मातृसत्तात्मक होने का संकेत देती हैं।
3. सैंधव लिपि और विज्ञान एवं तकनीक
- हड़प्पा की लिपि भाव-चित्रात्मक (Pictographic) थी, जिसे मूल रूप से दाएं से बाएं पढ़ा/लिखा जाता था। इसे 'बूस्ट्रोफेडन' (Boustrophedon) शैली भी कहा जाता है। इस लिपि में सबसे अधिक इस्तेमाल अंग्रेजी के 'U' अक्षर के चिह्नों का हुआ है।
- तकनीक में वे अत्यंत उन्नत थे। लोथल से प्राप्त एक मिट्टी की प्लेट पर 'बीज बोने की मशीन' (Seed drill) का चित्र मिला है। इतिहासकार ए. एल. बाशम ने कहा था कि 'कपास उगाने और उसके उपयोग की तकनीक दुनिया को हड़प्पा की ही देन है।'
सिंधु सभ्यता के पतन के कारण
- इतने विशाल और विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्र का विनाश किसी एक कारण से होना असंभव है। अतः अलग-अलग नगरों के पतन के कारण भी अलग-अलग थे (जैसे जलवायु परिवर्तन, आर्यों का आक्रमण आदि)।
- बाढ़ (Flood): यह पतन का सबसे मान्य कारण माना जाता है। सर जॉन मार्शल ने मोहनजोदड़ो, मैके ने चन्हूदड़ो और एस. आर. राव ने लोथल (भोगवा नदी में आई बाढ़) के विनाश का मुख्य कारण भयंकर बाढ़ को ही बताया है।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (One-Liner Facts)
- सिंधु घाटी सभ्यता मुख्य रूप से आद्य-ऐतिहासिक काल (Proto-historic period) और कांस्य युग से संबंधित है, जिसका सर्वमान्य समय 2500 से 1750 ईसा पूर्व है।
- सर्वप्रथम चार्ल्स मैसन ने 1826 ई. में हड़प्पा के टीलों की ऐतिहासिकता की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया था।
- इस संपूर्ण सभ्यता का भौगोलिक विस्तार त्रिभुजाकार (Triangular) आकृति का है।
- पूरी सभ्यता का सबसे बड़ा पुरास्थल गनवेरीवाला है (पाकिस्तान के पंजाब में हकरा नदी के तट पर)। वहीं सबसे अधिक बस्तियां सरस्वती नदी घाटी में खोजी गई हैं।
- हड़प्पा से 15 कमरों वाली विशाल श्रमिक बैरक (मजदूरों की बस्ती) और 18 गोल ईंटों के चबूतरे (जहाँ राख, गेहूं और जौ के प्रमाण मिले) प्राप्त हुए हैं।
- हड़प्पा के दुर्ग क्षेत्र के दक्षिण में एक कब्रिस्तान मिला है जिसे 'R-37' कहा जाता है (यहाँ 37 कब्रें मिलीं)। यह बेहद चौंकाने वाला तथ्य है कि मोहनजोदड़ो से आज तक कोई कब्रिस्तान नहीं मिला है।
- धौलावीरा (गुजरात) एक ऐसा विशिष्ट नगर था जिसे तीन भागों में बांटा गया था और यहाँ की जल-प्रबंधन प्रणाली (Water Harvesting System) सबसे उन्नत थी।
- कालीबंगा में सड़कों और गलियों की चौड़ाई का एक गणितीय अनुपात देखने को मिलता है (गलियां 1.8 मीटर चौड़ी और मुख्य सड़कें उसी के गुणक में)।
- कालीबंगा से एक बच्चे की खोपड़ी मिली है जिसमें 6 सुराख (छेद) हैं, इसे विद्वान शल्य चिकित्सा (Brain Surgery) का सबसे प्राचीन प्रमाण मानते हैं। यहाँ से प्राक्-हड़प्पा संस्कृति के प्रमाण और एक सींग वाले देवता की मृणपट्टिका भी मिली है।
- अपवाद के रूप में, लोथल एकमात्र ऐसा शहर था जहाँ घरों के मुख्य दरवाजे पीछे गली में न खुलकर सामने मुख्य सड़क की ओर खुलते थे।
- धर्म के मामले में, हड़प्पावासी मातृदेवी की पूजा सबसे अधिक करते थे (भारत में मूर्ति पूजा का प्राचीनतम साक्ष्य यहीं से माना जाता है)। पुरुष देवता के रूप में 'आदि शिव' (पशुपतिनाथ) की पूजा होती थी और उनका सबसे पूजनीय पशु कुबड़ वाला बैल था।
- सिंधु घाटी की महिलाएं साज-सज्जा की शौकीन थीं और वे 16 अलग-अलग प्रकार से अपने बाल संवारती थीं। पुरुष आमतौर पर दाढ़ी मुंडवाते थे, यद्यपि मोहनजोदड़ो से वर्गाकार (Square) दाढ़ी रखने के भी साक्ष्य मिले हैं।
- हड़प्पा, आम्बी, कोटदीजी, कालीबंगा और बनावली में खुदाई के दौरान हड़प्पा सभ्यता की परतों के ठीक नीचे उससे भी पुरानी (पूर्व-सैंधव) संस्कृतियों के निशान दबे हुए मिले हैं।
- मोहनजोदड़ो की एक मुहर पर ढोल (Drum) जैसी कोई आकृति बजाते हुए एक इंसान का आकर्षक चित्रण मिला है।
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