भारत के राष्ट्रीय मामले से संबंधित
┃🔰भारत के राष्ट्रीय मामले से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न 🔰┃
𝗜𝗺𝗽𝗼𝗿𝘁𝗮𝗻𝘁 𝗤𝘂𝗲𝘀𝘁𝗶𝗼𝗻𝘀
𝗙𝗼𝗿 𝗔𝗹𝗹 𝗖𝗼𝗺𝗽𝗲𝘁𝗶𝘁𝗶𝘃𝗲 𝗘𝘅𝗮𝗺s
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सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2026 के अनुसार, CJI को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या कितनी कर दी गई है?
33|38|34|37
37
व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2026 के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ाकर 37 कर दी गई। इससे पहले यह संख्या 33 थी। इस वृद्धि का मुख्य उद्देश्य बढ़ते हुए लंबित मामलों को नियंत्रित करना और न्यायिक प्रक्रिया को तेज करना है। संशोधन के बाद कुल न्यायाधीशों की संख्या (CJI सहित) 38 हो गई है। यह बदलाव संसद द्वारा पारित विधेयक और राष्ट्रपति की अनुमति के बाद प्रभावी हुआ।
मूल संविधान, 1950 में CJI को छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या कितनी थी?
8|11|10|7
7
व्याख्या: भारतीय संविधान के मूल रूप में अनुच्छेद 124(1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अलावा अधिकतम 7 अन्य न्यायाधीशों का प्रावधान किया गया था। इस प्रकार कुल 8 न्यायाधीशों का कोरम निर्धारित था। बाद में विभिन्न संशोधन अधिनियमों के माध्यम से यह संख्या समय-समय पर बढ़ाई गई। 1956 के अधिनियम में इसे बढ़ाकर 10 किया गया, फिर 1960 में 13, 1977 में 17, 1986 में 25 और 2009 में 30 तक बढ़ाया गया।
सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के लिए किस मूल अधिनियम में संशोधन किया गया है?
अधिनियम, 1977|अधिनियम, 1956|अधिनियम, 1950|अधिनियम, 2019
अधिनियम, 1956
व्याख्या: सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को विनियमित करने का मूल अधिकार सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 द्वारा प्रदान किया गया था। इसी अधिनियम में समय-समय पर संशोधन करके न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जाती रही है। 2026 का संशोधन भी इसी 1956 के मूल अधिनियम में किया गया है। संविधान का अनुच्छेद 124(1) संसद को यह शक्ति देता है कि वह कानून बनाकर न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करे।
भारत के 18वें विधि आयोग ने अपनी 229वीं रिपोर्ट (2009) में किस सुझाव का प्रस्ताव दिया था?
क्षेत्रीय अपीलीय पीठों की स्थापना|संविधान पीठ को समाप्त करना|न्यायाधीशों का कार्यकाल बढ़ाना|न्यायाधीशों की संख्या दोगुनी करना
क्षेत्रीय अपीलीय पीठों की स्थापना
व्याख्या: न्यायमूर्ति ए. आर. लक्ष्मणन की अध्यक्षता वाले 18वें विधि आयोग ने अपनी 229वीं रिपोर्ट (2009) में सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते लंबित मामलों की समस्या के समाधान के लिए क्षेत्रीय अपीलीय पीठों की स्थापना का सुझाव दिया था। आयोग ने दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता और मुंबई जैसे स्थानों पर क्षेत्रीय पीठें स्थापित करने की सिफारिश की थी ताकि उच्च न्यायालयों से आने वाली अपीलों का त्वरित निपटान हो सके। हालांकि पूर्ण पीठ ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।
2026 के संशोधन से पहले, सुप्रीम कोर्ट में CJI को शामिल करके कुल स्वीकृत न्यायाधीश संख्या कितनी थी?
38|37|34|33
34
व्याख्या: 2026 के संशोधन से पहले सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सहित कुल स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या 34 थी (CJI + 33 अन्य न्यायाधीश)। 2009 के संशोधन में यह संख्या 31 से बढ़ाकर 34 की गई थी। 2026 के संशोधन के बाद CJI को छोड़कर 37 न्यायाधीश हो गए, जिससे कुल संख्या 38 हो गई। यह वृद्धि लंबित मामलों के बढ़ते बोझ को देखते हुए की गई।
संसद सत्र में न होने पर सरकार ने न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के लिए किस अनुच्छेद के तहत अध्यादेश जारी किया?
अनुच्छेद 126|अनुच्छेद 121|अनुच्छेद 123|अनुच्छेद 124
अनुच्छेद 123
व्याख्या: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों के सत्र न चलने की स्थिति में अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्राप्त है। 2026 में संसद सत्र में न होने के कारण सरकार ने इसी अनुच्छेद के अंतर्गत अध्यादेश जारी कर सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान किया। अध्यादेश को संसद के पुनः सत्र शुरू होने के छह सप्ताह के भीतर अधिनियम में बदलना अनिवार्य होता है।
1 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या कितनी थी?
92,101|92,823|65,615|75,410
92,101
व्याख्या: 1 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 92,101 दर्ज की गई थी। यह आंकड़ा न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। वर्ष 2025 के दौरान लगभग 75,410 नए मामले दर्ज हुए थे। लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के कारण न्यायिक प्रणाली पर दबाव बढ़ा और 2026 के संशोधन के माध्यम से न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया गया।
सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने किस वर्ष दिल्ली के बाहर पीठ बैठने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था?
2011|2009|2008|2010
2010
व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने वर्ष 2010 में दिल्ली के बाहर क्षेत्रीय पीठ बैठाने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। 18वें विधि आयोग की 229वीं रिपोर्ट (2009) में क्षेत्रीय अपीलीय पीठों की स्थापना का सुझाव दिया गया था, लेकिन पूर्ण पीठ ने इस प्रस्ताव को न्यायिक एकता और सुप्रीम कोर्ट की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए नामंजूर कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2026 को राष्ट्रपति की अनुमति कब प्राप्त हुई?
5 मई 2026|14 अगस्त 2026|12 अगस्त 2026|11 अगस्त 2026
14 अगस्त 2026
व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2026 को राष्ट्रपति की अनुमति 14 अगस्त 2026 को प्राप्त हुई। इससे पहले यह विधेयक लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में पारित हो चुका था। राष्ट्रपति की अनुमति मिलने के बाद यह अधिनियम प्रभावी हो गया और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान लागू हुआ।
1986 के संशोधन अधिनियम के बाद CJI को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या कितनी निर्धारित की गई थी?
25|30|33|17
25
व्याख्या: 1986 के संशोधन अधिनियम के बाद सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 25 निर्धारित की गई थी। इससे पहले 1977 में यह संख्या 17 थी। 1986 के बाद क्रमशः 2009 में 30 और फिर 2026 में 37 करने का प्रावधान किया गया। प्रत्येक वृद्धि लंबित मामलों और न्यायिक कार्यभार को देखते हुए की गई।
सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को विनियमित करने का अधिकार किस अधिनियम द्वारा मूलतः प्रदान किया गया है?
न्यायिक क्षमता अधिनियम, 2019|संविधान का अनुच्छेद 124(1)|सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2026|सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956
व्याख्या: सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को विनियमित करने का मूल अधिकार सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 द्वारा प्रदान किया गया था। संविधान का अनुच्छेद 124(1) संसद को यह शक्ति देता है कि वह कानून द्वारा न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करे। 1956 का अधिनियम ही मूल कानून है जिसमें समय-समय पर संशोधन किए जाते रहे हैं। 2026 का अधिनियम भी इसी मूल अधिनियम में संशोधन है।
2025 के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में कितने नए मामले दर्ज किए गए थे?
92,823|65,615|75,410|92,101
75,410
व्याख्या: वर्ष 2025 के दौरान सुप्रीम कोर्ट में कुल 75,410 नए मामले दर्ज किए गए थे। यही संख्या 1 जनवरी 2026 को लंबित मामलों के आंकड़े को प्रभावित करती है। नए मामलों की निरंतर वृद्धि और पुराने मामलों के निपटान की धीमी गति के कारण लंबित मामलों का बोझ बढ़ा, जिसके परिणामस्वरूप 2026 में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया गया।
30 अप्रैल 2026 तक सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या कितनी दर्ज की गई थी?
82,300|75,410|92,101|92,823
92,823
व्याख्या: 30 अप्रैल 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 92,823 दर्ज की गई थी। जनवरी में यह संख्या 92,101 थी। चार महीनों में मामूली वृद्धि हुई, जो दर्शाता है कि नए मामलों का आना जारी रहा। इसी दबाव को देखते हुए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का संशोधन अधिनियम पारित किया गया।
1960 के संशोधन अधिनियम के बाद, सर्वोच्च न्यायालय में CJI को छोड़कर न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या क्या थी?
10|13|17|25
13
व्याख्या: 1960 के संशोधन अधिनियम के बाद सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 13 कर दी गई थी। इससे पहले 1956 में यह संख्या 10 थी। 1960 के बाद 1977 में 17, 1986 में 25, 2009 में 30 और 2026 में 37 करने का क्रम चला। प्रत्येक संशोधन कार्यभार बढ़ने के कारण किया गया।
यदि संसद सत्र में न हो और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ानी हो, तो सरकार किस अनुच्छेद के तहत अध्यादेश ला सकती है?
अनुच्छेद 143|अनुच्छेद 124|अनुच्छेद 131|अनुच्छेद 123
अनुच्छेद 123
व्याख्या: संविधान के अनुच्छेद 123 के अंतर्गत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि जब संसद के दोनों सदनों का सत्र न चल रहा हो तो वह अध्यादेश जारी कर सकता है। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के लिए 2026 में इसी प्रावधान का उपयोग किया गया। अध्यादेश को संसद के पुनः सत्र शुरू होने के छह सप्ताह के भीतर अधिनियम में परिवर्तित करना अनिवार्य होता है अन्यथा वह स्वतः समाप्त हो जाता है।
संसद की पुनः बैठक के कितने समय के भीतर अध्यादेश को अधिनियम से बदलना अनिवार्य है?
छह सप्ताह|चार सप्ताह|आठ सप्ताह|तीन सप्ताह
छह सप्ताह
व्याख्या: संविधान के अनुसार अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों के पुनः सत्र शुरू होने के छह सप्ताह के भीतर अधिनियम में बदलना अनिवार्य है। यदि यह नहीं किया जाता तो अध्यादेश स्वतः समाप्त हो जाता है। 2026 के न्यायाधीश संख्या बढ़ाने वाले अध्यादेश को भी इसी समय सीमा के अंदर संसद में प्रस्तुत कर अधिनियम में बदला गया।
5 मई 2026 को कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या और स्वीकृत संख्या के बीच क्या अंतर था?
5 न्यायाधीश कम थे|2 न्यायाधीश कम थे|कोई अंतर नहीं था|4 न्यायाधीश कम थे
2 न्यायाधीश कम थे
व्याख्या: 5 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या स्वीकृत संख्या से 2 कम थी। अर्थात रिक्तियां मौजूद थीं। स्वीकृत संख्या 34 (CJI सहित) होने के बावजूद कुछ पद रिक्त थे। बाद में 2026 के संशोधन से स्वीकृत संख्या बढ़ाई गई ताकि अधिक न्यायाधीश नियुक्त किए जा सकें और लंबित मामलों का निपटान तेज हो।
18वें विधि आयोग ने अपनी 229वीं रिपोर्ट में किन स्थानों पर क्षेत्रीय अपीलीय पीठ स्थापित करने का सुझाव दिया था?
दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, कोलकाता और अहमदाबाद|हैदराबाद, बेंगलुरु, दिल्ली, मुंबई और इंदौर|मुंबई, पुणे, चेन्नई, कोलकाता और लखनऊ|दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई
दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई
व्याख्या: 18वें विधि आयोग ने अपनी 229वीं रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय अपीलीय पीठें दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई में स्थापित करने का सुझाव दिया था। उद्देश्य था कि उच्च न्यायालयों से आने वाली अपीलों का निपटान क्षेत्रीय स्तर पर हो सके और दिल्ली स्थित मुख्य पीठ पर दबाव कम हो। हालांकि पूर्ण पीठ ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को लोकसभा द्वारा कब पारित किया गया था?
11 अगस्त 2026|14 अगस्त 2026|5 मई 2026|12 अगस्त 2026
11 अगस्त 2026
व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को लोकसभा ने 11 अगस्त 2026 को पारित किया। इसके बाद राज्यसभा में भी इसे पारित किया गया और अंततः 14 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हुई। लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा में भी शीघ्रता से पारित कर इसे कानून का रूप दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को राज्यसभा द्वारा कब पारित किया गया था?
18 अगस्त 2026|12 अगस्त 2026|14 अगस्त 2026|11 अगस्त 2026
12 अगस्त 2026
व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को राज्यसभा ने 12 अगस्त 2026 को पारित किया। लोकसभा में 11 अगस्त को पारित होने के एक दिन बाद ही राज्यसभा ने भी इसे मंजूरी दे दी। दोनों सदनों से पारित होने के बाद 14 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति की अनुमति मिली और अधिनियम प्रभावी हो गया।
संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अनुसार, मूल रूप से सर्वोच्च न्यायालय में CJI के अलावा कितने अन्य न्यायाधीशों का प्रावधान था?
11|10|7|8
7
व्याख्या: संविधान के अनुच्छेद 124(1) में मूल रूप से यह प्रावधान था कि सर्वोच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और अधिकतम सात अन्य न्यायाधीश होंगे। अर्थात कुल आठ न्यायाधीश। संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह कानून बनाकर इस संख्या को बढ़ा सकती है। इसी प्रावधान के आधार पर बाद में विभिन्न संशोधन अधिनियमों के माध्यम से संख्या बढ़ाई गई।
1956 के मूल अधिनियम में CJI को छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय में अधिकतम न्यायाधीशों की संख्या कितनी निर्धारित की गई थी?
7|17|10|13
10
व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर अधिकतम 10 न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित की गई थी। इससे मूल संवैधानिक प्रावधान (7) में वृद्धि हुई। 1960 में इसे 13, 1977 में 17, 1986 में 25 और बाद में और बढ़ाया गया। 1956 का अधिनियम ही मूल कानून है जिसमें सभी बाद के संशोधन किए गए।
2025 के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में कितने नए मामले दर्ज किए गए थे?
65,615|75,410|92,823|92,101
75,410
व्याख्या: 2025 के दौरान सुप्रीम कोर्ट में 75,410 नए मामले दर्ज हुए। यह आंकड़ा वर्ष भर में आए नए मुकदमों की संख्या को दर्शाता है। नए मामलों की निरंतर वृद्धि और पुराने मामलों के निपटान की गति के बीच असंतुलन के कारण लंबित मामलों का आंकड़ा ऊंचा बना रहा, जिसके परिणामस्वरूप न्यायाधीश संख्या बढ़ाने की मांग मजबूत हुई।
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को राष्ट्रपति की अनुमति किस तिथि को प्राप्त हुई?
14 अगस्त 2026|12 अगस्त 2026|11 अगस्त 2026|5 मई 2026
14 अगस्त 2026
व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को राष्ट्रपति की अनुमति 14 अगस्त 2026 को प्राप्त हुई। लोकसभा और राज्यसभा दोनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति ने इस पर अपनी सहमति दी। अनुमति मिलने के साथ ही यह अधिनियम बन गया और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान लागू हो गया।
न्यायमूर्ति ए. आर. लक्ष्मणन की अध्यक्षता वाले 18वें विधि आयोग ने अपनी 229वीं रिपोर्ट (2009) में क्या प्रमुख सुझाव दिया था?
न्यायाधीशों की संख्या दोगुनी करना|सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाना|क्षेत्रीय अपीलीय पीठ की स्थापना|डिजिटल कोर्ट का अनिवार्य गठन
क्षेत्रीय अपीलीय पीठ की स्थापना
व्याख्या: 18वें विधि आयोग ने न्यायमूर्ति ए. आर. लक्ष्मणन की अध्यक्षता में 229वीं रिपोर्ट (2009) में सुप्रीम कोर्ट में क्षेत्रीय अपीलीय पीठों की स्थापना का प्रमुख सुझाव दिया था। आयोग का मानना था कि क्षेत्रीय पीठों से उच्च न्यायालयों से आने वाली अपीलों का त्वरित निपटान संभव होगा और दिल्ली स्थित मुख्य पीठ पर दबाव कम होगा। हालांकि इस प्रस्ताव को पूर्ण पीठ ने अस्वीकार कर दिया।
संसद सत्र में न होने पर, न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा किस अनुच्छेद के तहत अध्यादेश जारी किया गया था?
अनुच्छेद 126|अनुच्छेद 130|अनुच्छेद 123|अनुच्छेद 124
अनुच्छेद 123
व्याख्या: संसद सत्र में न होने की स्थिति में सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश जारी कर सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान किया। अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति को आपात स्थिति में अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। बाद में इसे संसद में प्रस्तुत कर अधिनियम में बदल दिया गया।
NCDC के संदर्भ में कौन सा कथन सत्य है?
NCDC सहकारी समितियों के शेयर पूंजी में निवेश नहीं कर सकता|NCDC का संबंध केवल बैंकिंग संस्थाओं से है|NCDC केवल राज्य सरकारों के माध्यम से ही ऋण दे सकता है|NCDC अब सीधे सहकारी समितियों को ऋण और अनुदान दे सकता है
NCDC अब सीधे सहकारी समितियों को ऋण और अनुदान दे सकता है
व्याख्या: राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) अधिनियम में 2026 के संशोधन के बाद NCDC को सीधे सहकारी समितियों को ऋण और अनुदान देने की शक्ति प्राप्त हो गई है। पहले यह मुख्य रूप से राज्य सरकारों के माध्यम से ही सहायता प्रदान करता था। संशोधन के बाद प्रत्यक्ष या मध्यवर्ती दोनों माध्यमों से सहायता देने का प्रावधान किया गया है, जिससे सहकारी समितियों को अधिक सुगमता से वित्तीय सहायता मिल सकेगी।
सहकारी समितियों के संबंध में 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 का मुख्य उद्देश्य क्या था?
सहकारी समितियों को संवैधानिक मान्यता प्रदान करना|सहकारी समितियों को केंद्र सरकार के अधीन करना|सहकारी समितियों को केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित करना|सहकारी समितियों के लिए अनिवार्य सदस्यता लागू करना
सहकारी समितियों को संवैधानिक मान्यता प्रदान करना
व्याख्या: 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 का मुख्य उद्देश्य सहकारी समितियों को संवैधानिक मान्यता प्रदान करना था। इसके माध्यम से संविधान में भाग IXB जोड़ा गया जिसमें सहकारी समितियों से संबंधित प्रावधान शामिल किए गए। अनुच्छेद 19(1)(c) में सहकारी समितियां बनाने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया गया तथा अनुच्छेद 43B में राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के तहत सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन को बढ़ावा देने का प्रावधान किया गया।
संविधान के किस अनुच्छेद के तहत सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन को बढ़ावा दिया गया है?
अनुच्छेद 43B|अनुच्छेद 32|अनुच्छेद 19(1)(a)|अनुच्छेद 124(1)
अनुच्छेद 43B
व्याख्या: संविधान के अनुच्छेद 43B (जो 97वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया) के अंतर्गत राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के तहत सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यप्रणाली, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने का निर्देश दिया गया है। यह अनुच्छेद सहकारी आंदोलन को मजबूत करने के लिए राज्य पर नैतिक बाध्यता डालता है।
राज्य सूची की प्रविष्टि 32 के अंतर्गत कौन सी सहकारी समितियां आती हैं?
अंतरराष्ट्रीय स्तर की सहकारी समितियां|बहु-राज्य सहकारी समितियां|किसी राज्य के भीतर कार्य करने वाली समितियां|केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित समितियां
किसी राज्य के भीतर कार्य करने वाली समितियां
व्याख्या: संविधान की राज्य सूची की प्रविष्टि 32 के अंतर्गत किसी राज्य के भीतर कार्य करने वाली सहकारी समितियां आती हैं। इनका विनियमन राज्य सरकार के अधीन होता है। बहु-राज्य सहकारी समितियां संघ सूची की प्रविष्टि के अंतर्गत आती हैं और केंद्र सरकार द्वारा विनियमित होती हैं। राज्य सूची की प्रविष्टि 32 सहकारी समितियों, व्यापार संघों आदि को कवर करती है।
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2026 के बाद CJI को छोड़कर स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या क्या है?
33|37|38|34
37
व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2026 के बाद मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या 37 हो गई है। इससे पहले यह संख्या 33 थी। कुल मिलाकर CJI सहित 38 न्यायाधीश हो गए। यह वृद्धि लंबित मामलों के बढ़ते बोझ को नियंत्रित करने के उद्देश्य से की गई।
संविधान के किस अनुच्छेद के तहत सरकार ने न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने हेतु अध्यादेश जारी किया था?
अनुच्छेद 126|अनुच्छेद 32|अनुच्छेद 123|अनुच्छेद 124
अनुच्छेद 123
व्याख्या: सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 123 के अंतर्गत अध्यादेश जारी कर सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान किया। अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति को संसद सत्र न चलने की स्थिति में अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। बाद में इसे संसद में प्रस्तुत कर अधिनियम में परिवर्तित कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्राथमिक कारण क्या बताया गया है?
सुप्रीम कोर्ट की प्रशासनिक शक्तियां बढ़ाना|बढ़ते हुए लंबित मामलों (बैकलॉग) को नियंत्रित करना|न्यायाधीशों का कार्यकाल कम करना|नए न्यायालय भवनों का निर्माण करना
बढ़ते हुए लंबित मामलों (बैकलॉग) को नियंत्रित करना
व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्राथमिक कारण बढ़ते हुए लंबित मामलों (बैकलॉग) को नियंत्रित करना बताया गया। 1 जनवरी 2026 को लंबित मामलों की संख्या 92,101 थी और अप्रैल तक यह 92,823 हो गई। अधिक न्यायाधीश होने से मामलों का निपटान तेज होगा और न्याय में देरी कम होगी।
भारत के 18वें विधि आयोग ने अपनी 229वीं रिपोर्ट में किस विषय पर विचार किया था?
सहकारी समितियों का पुनर्गठन|सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की समस्या|न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु|संविधान संशोधन की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की समस्या
व्याख्या: 18वें विधि आयोग ने अपनी 229वीं रिपोर्ट (2009) में मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की समस्या पर विचार किया था। आयोग ने क्षेत्रीय अपीलीय पीठों की स्थापना का सुझाव देकर इस समस्या का समाधान खोजने का प्रयास किया। लंबित मामलों का बोझ न्यायिक प्रणाली की दक्षता को प्रभावित कर रहा था।
18वें विधि आयोग की रिपोर्ट में उच्च न्यायालय से आने वाली अपीलों के लिए क्या सुझाव दिया गया था?
अपीलों की संख्या को सीमित करना|चार क्षेत्रीय अपीलीय पीठों का गठन|सुप्रीम कोर्ट की एक और शाखा दिल्ली में खोलना|सभी अपीलों का निपटारा जिला न्यायालयों में करना
चार क्षेत्रीय अपीलीय पीठों का गठन
व्याख्या: 18वें विधि आयोग ने उच्च न्यायालयों से आने वाली अपीलों के त्वरित निपटान के लिए चार क्षेत्रीय अपीलीय पीठों का गठन करने का सुझाव दिया था। इन पीठों से अपीलों का क्षेत्रीय स्तर पर निपटान संभव होता और मुख्य पीठ पर दबाव कम होता। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या में 2019 के बाद पहली वृद्धि कब हुई?
2024 में|2026 में|2023 में|2025 में
2026 में
व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या में 2019 के बाद पहली वृद्धि 2026 में हुई। 2009 में संख्या 30 से बढ़ाकर 34 (CJI सहित) की गई थी और उसके बाद 2026 तक कोई वृद्धि नहीं हुई। 2026 के संशोधन में CJI को छोड़कर संख्या 37 कर दी गई।
अध्यादेश को संसद के सत्र के पुनः शुरू होने के कितने समय के भीतर अधिनियम के रूप में बदलना आवश्यक है?
छह महीने|छह सप्ताह|तीन सप्ताह|तीन महीने
छह सप्ताह
व्याख्या: संविधान के अनुसार अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों के सत्र पुनः शुरू होने के छह सप्ताह के भीतर अधिनियम में बदलना आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं होता तो अध्यादेश स्वतः समाप्त हो जाता है। 2026 के न्यायाधीश संख्या बढ़ाने वाले अध्यादेश को भी इसी समय सीमा के अंदर अधिनियम में परिवर्तित किया गया।
सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने दिल्ली के बाहर बैठने के प्रस्ताव को कब अस्वीकार किया था?
5 मई 2026|18 फरवरी 2009|18 फरवरी 2010|1 जनवरी 2026
18 फरवरी 2010
व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने 18 फरवरी 2010 को दिल्ली के बाहर क्षेत्रीय पीठ बैठाने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। 18वें विधि आयोग की रिपोर्ट में दिए गए सुझाव के बावजूद पूर्ण पीठ ने न्यायिक एकता और सुप्रीम कोर्ट की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव को नामंजूर किया।
NCDC के संदर्भ में, 'खाद्य पदार्थों' (Foodstuffs) की परिभाषा में हाल ही में क्या विस्तार किया गया है?
इसमें केवल अनाज और दालों को शामिल किया गया है|इसमें कृषि उपकरणों को भी खाद्य श्रेणी में जोड़ा गया है|इसमें केवल बागवानी उत्पादों को शामिल किया गया है|इसमें प्रसंस्कृत खाद्य, अन्य खाद्य उत्पाद और अधिसूचित वस्तुएं शामिल हैं
इसमें प्रसंस्कृत खाद्य, अन्य खाद्य उत्पाद और अधिसूचित वस्तुएं शामिल हैं
व्याख्या: NCDC अधिनियम में 2026 के संशोधन के बाद 'खाद्य पदार्थों' (Foodstuffs) की परिभाषा का विस्तार किया गया है। अब इसमें प्रसंस्कृत खाद्य, अन्य खाद्य उत्पाद और अधिसूचित वस्तुएं भी शामिल हैं। पहले की तुलना में यह परिभाषा व्यापक हो गई है, जिससे सहकारी समितियां अधिक प्रकार के उत्पादों के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकती हैं।
संविधान की किस प्रविष्टि (Entry) के अंतर्गत किसी राज्य के भीतर कार्य करने वाली सहकारी समितियां आती हैं?
संघ सूची की प्रविष्टि 32|समवर्ती सूची की प्रविष्टि 43|राज्य सूची की प्रविष्टि 19|राज्य सूची की प्रविष्टि 32
राज्य सूची की प्रविष्टि 32
व्याख्या: संविधान की राज्य सूची की प्रविष्टि 32 के अंतर्गत किसी राज्य के भीतर कार्य करने वाली सहकारी समितियां आती हैं। इनका विनियमन संबंधित राज्य सरकार के अधीन होता है। बहु-राज्य सहकारी समितियां संघ सूची के अंतर्गत आती हैं। प्रविष्टि 32 सहकारी समितियों, व्यापार संघों, धर्मार्थ संस्थाओं आदि को कवर करती है।
भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद राष्ट्रपति को संसद का सत्र न चलने पर अध्यादेश जारी करने की शक्ति देता है?
अनुच्छेद 124|अनुच्छेद 143|अनुच्छेद 123|अनुच्छेद 138
अनुच्छेद 123
व्याख्या: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों का सत्र न चलने की स्थिति में अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। अध्यादेश का प्रभाव संसद द्वारा पारित कानून के समान होता है, लेकिन इसे संसद के पुनः सत्र शुरू होने के छह सप्ताह के भीतर अधिनियम में बदलना आवश्यक है।
30 अप्रैल 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या कितनी हो गई थी?
65,615|92,101|75,410|92,823
92,823
व्याख्या: 30 अप्रैल 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 92,823 हो गई थी। जनवरी में यह 92,101 थी। चार महीनों में मामूली वृद्धि दर्ज की गई। लंबित मामलों का यह आंकड़ा न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता को और मजबूत करता है।
न्यायमूर्ति ए. आर. लक्ष्मण की अध्यक्षता में 18वें विधि आयोग की 229वीं रिपोर्ट में किस समस्या के समाधान पर चर्चा की गई थी?
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों का बोझ|उच्च न्यायालयों के जजों का स्थानांतरण|सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया|सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय शाखाओं का निर्माण
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों का बोझ
व्याख्या: न्यायमूर्ति ए. आर. लक्ष्मणन की अध्यक्षता में 18वें विधि आयोग की 229वीं रिपोर्ट में मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के बोझ की समस्या और उसके समाधान पर चर्चा की गई थी। आयोग ने क्षेत्रीय अपीलीय पीठों की स्थापना का सुझाव देकर इस समस्या का समाधान खोजने का प्रयास किया।
18वें विधि आयोग ने उच्च न्यायालयों से आने वाली अपीलों के त्वरित निपटान हेतु क्या सुझाव दिया था?
चार क्षेत्रीय अपीलीय पीठों (Regional Benches) का गठन|सभी अपीलों को ऑनलाइन सुनवाई के लिए अनिवार्य करना|सुप्रीम कोर्ट के कार्य समय में दो घंटे की वृद्धि|सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या को दोगुना करना
चार क्षेत्रीय अपीलीय पीठों (Regional Benches) का गठन
व्याख्या: 18वें विधि आयोग ने उच्च न्यायालयों से आने वाली अपीलों के त्वरित निपटान के लिए चार क्षेत्रीय अपीलीय पीठों के गठन का सुझाव दिया था। इन पीठों से अपीलों का क्षेत्रीय स्तर पर निपटान संभव होता और मुख्य पीठ पर दबाव कम होता। हालांकि पूर्ण पीठ ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) अधिनियम, 2026 को राष्ट्रपति द्वारा किस तिथि को मंजूरी दी गई थी?
10 अगस्त 2026|11 अगस्त 2026|22 अगस्त 2026|14 अगस्त 2026
14 अगस्त 2026
व्याख्या: राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) अधिनियम, 2026 को राष्ट्रपति द्वारा 14 अगस्त 2026 को मंजूरी दी गई। इससे पहले विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारित हो चुका था। मंजूरी मिलने के साथ ही NCDC के कार्यक्षेत्र और वित्तीय दायरे का विस्तार प्रभावी हो गया।
राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) की स्थापना किस अधिनियम के तहत की गई थी?
राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम, 1962|राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम, 2002|राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम, 1973|राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम, 1974
राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम, 1962
व्याख्या: राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) की स्थापना राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम, 1962 के तहत की गई थी। यह निगम सहकारी समितियों को वित्तीय और अन्य सहायता प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया। 2026 के संशोधन से पहले इसमें 1973, 1974 और 2002 में संशोधन हो चुके थे।
NCDC अधिनियम में 2026 के संशोधन से पहले किन वर्षों में संशोधन किए जा चुके थे?
1965, 1980, 2000|1970, 1975, 2005|1973, 1974, 2002|1972, 1978, 2004
1973, 1974, 2002
व्याख्या: NCDC अधिनियम, 1962 में 2026 के संशोधन से पहले 1973, 1974 और 2002 में संशोधन किए जा चुके थे। इन संशोधनों के माध्यम से समय-समय पर निगम के कार्यक्षेत्र और शक्तियों का विस्तार किया गया। 2026 का संशोधन सबसे व्यापक है जिसमें प्रत्यक्ष सहायता और खाद्य पदार्थों की परिभाषा का विस्तार शामिल है।
संशोधन अधिनियम 2026 के अनुसार, NCDC किस मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है?
कृषि मंत्रालय|ग्रामीण विकास मंत्रालय|वित्त मंत्रालय|सहकारिता मंत्रालय
सहकारिता मंत्रालय
व्याख्या: संशोधन अधिनियम 2026 के अनुसार NCDC सहकारिता मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है। पहले यह कृषि मंत्रालय या अन्य मंत्रालयों के अधीन रहा, लेकिन सहकारिता मंत्रालय के गठन के बाद इसे इसके अधीन कर दिया गया। इससे सहकारी क्षेत्र को केंद्रित ध्यान मिलने लगा है।
संशोधन अधिनियम 2026 का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
NCDC के कार्यक्षेत्र और वित्तीय दायरे का विस्तार करना|NCDC के लिए अतिरिक्त बजटीय सहायता का सृजन करना|केवल कृषि आधारित सहकारी समितियों को ऋण प्रदान करना|सहकारी समितियों को पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में लाना
NCDC के कार्यक्षेत्र और वित्तीय दायरे का विस्तार करना
व्याख्या: संशोधन अधिनियम 2026 का प्राथमिक उद्देश्य NCDC के कार्यक्षेत्र और वित्तीय दायरे का विस्तार करना है। अब NCDC सीधे या मध्यवर्ती माध्यमों से सहकारी समितियों को सहायता दे सकता है। खाद्य पदार्थों की परिभाषा का विस्तार और ग्रामीण क्षेत्र से संबंधित कुछ प्रतिबंध हटाने जैसे प्रावधान भी शामिल किए गए हैं।
संशोधित अधिनियम के तहत, NCDC सहकारी समितियों को सहायता प्रदान करने के लिए किन माध्यमों का उपयोग कर सकता है?
केवल प्रत्यक्ष सहायता|प्रत्यक्ष या मध्यवर्ती माध्यम|केवल मध्यवर्ती माध्यम|केवल राज्य सरकारों के माध्यम से
प्रत्यक्ष या मध्यवर्ती माध्यम
व्याख्या: संशोधित अधिनियम 2026 के तहत NCDC सहकारी समितियों को सहायता प्रदान करने के लिए प्रत्यक्ष या मध्यवर्ती दोनों माध्यमों का उपयोग कर सकता है। पहले यह मुख्य रूप से राज्य सरकारों के माध्यम से ही सहायता देता था। अब सीधे समितियों को ऋण और अनुदान देने की सुविधा उपलब्ध है, जिससे प्रक्रिया सरल और तेज हो गई है।
नया संशोधन अधिनियम 2026 सहकारी समितियों के लिए 'खाद्य पदार्थों' (Foodstuffs) की परिभाषा में क्या शामिल करता है?
डेयरी और पशुपालन उत्पाद ही|केवल कच्चे कृषि उत्पाद|केवल अनाज और दालें|प्रसंस्कृत खाद्य और अन्य खाद्य उत्पाद
प्रसंस्कृत खाद्य और अन्य खाद्य उत्पाद
व्याख्या: नया संशोधन अधिनियम 2026 सहकारी समितियों के लिए 'खाद्य पदार्थों' की परिभाषा में प्रसंस्कृत खाद्य और अन्य खाद्य उत्पाद को शामिल करता है। पहले की सीमित परिभाषा का विस्तार कर अधिक प्रकार के उत्पादों को कवर किया गया है। इससे सहकारी समितियां प्रसंस्कृत खाद्य क्षेत्र में भी वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकेंगी।
संशोधन अधिनियम 2026 में ग्रामीण क्षेत्र से संबंधित किस प्रतिबंध को हटाने का प्रावधान है?
शेयर पूंजी निवेश संबंधी प्रतिबंध|वित्तीय लेनदेन संबंधी प्रतिबंध|विदेशी निवेश संबंधी प्रतिबंध|सहकारी औद्योगिक गतिविधियों संबंधी प्रतिबंध
सहकारी औद्योगिक गतिविधियों संबंधी प्रतिबंध
व्याख्या: संशोधन अधिनियम 2026 में ग्रामीण क्षेत्र से संबंधित सहकारी औद्योगिक गतिविधियों संबंधी प्रतिबंध को हटाने का प्रावधान किया गया है। इससे सहकारी समितियां औद्योगिक गतिविधियों में भी भाग ले सकेंगी और NCDC से सहायता प्राप्त कर सकेंगी। यह प्रावधान सहकारी क्षेत्र के विविधीकरण को बढ़ावा देता है।
भारतीय संविधान का कौन सा संशोधन अधिनियम सहकारी समितियों को संवैधानिक मान्यता प्रदान करता है?
97वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2011|91वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003|101वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2016|99वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2014
97वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2011
व्याख्या: 97वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 सहकारी समितियों को संवैधानिक मान्यता प्रदान करता है। इसके माध्यम से संविधान में भाग IXB जोड़ा गया, अनुच्छेद 19(1)(c) में सहकारी समितियां बनाने का अधिकार मौलिक अधिकार बनाया गया और अनुच्छेद 43B जोड़ा गया। यह संशोधन सहकारी आंदोलन को संवैधानिक दर्जा देता है।
संविधान के किस अनुच्छेद के तहत नागरिकों को 'सहकारी समितियां' बनाने का अधिकार प्राप्त है?
अनुच्छेद 19(1)(c)|अनुच्छेद 21(A)|अनुच्छेद 43(B)|अनुच्छेद 19(1)(b)
अनुच्छेद 19(1)(c)
व्याख्या: संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत नागरिकों को संघ या संघ बनाने का अधिकार प्राप्त है, जिसमें 97वें संशोधन के बाद सहकारी समितियां बनाने का अधिकार भी शामिल किया गया। यह मौलिक अधिकार है और राज्य इस पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है लेकिन इसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता।
संविधान का कौन सा अनुच्छेद राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के तहत सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन को बढ़ावा देता है?
अनुच्छेद 43B|अनुच्छेद 41|अनुच्छेद 44|अनुच्छेद 42
अनुच्छेद 43B
व्याख्या: संविधान का अनुच्छेद 43B (97वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया) राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के तहत सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यप्रणाली, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने का निर्देश देता है। यह राज्य पर नैतिक बाध्यता डालता है कि वह सहकारी आंदोलन को प्रोत्साहित करे।
संविधान के किस भाग में सहकारी समितियों से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं?
भाग X|भाग IX|भाग IXB|भाग IXA
भाग IXB
व्याख्या: संविधान के भाग IXB में सहकारी समितियों से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं। यह भाग 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा जोड़ा गया था। इसमें सहकारी समितियों के गठन, सदस्यता, प्रबंधन, चुनाव आदि से संबंधित विस्तृत प्रावधान शामिल हैं। भाग IX पंचायतों और भाग IXA नगर पालिकाओं से संबंधित है।
राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) विधेयक, 2026 संसद के दोनों सदनों में किस क्रम में पारित हुआ?
पहले राज्यसभा, फिर लोकसभा|केवल लोकसभा में पारित हुआ|दोनों सदनों में एक साथ पारित हुआ|पहले लोकसभा, फिर राज्यसभा
पहले लोकसभा, फिर राज्यसभा
व्याख्या: राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) विधेयक, 2026 पहले लोकसभा में पारित हुआ और उसके बाद राज्यसभा में पारित किया गया। दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हुई और यह अधिनियम बन गया। यह सामान्य विधायी प्रक्रिया के अनुसार हुआ।
संशोधन अधिनियम 2026 के अंतर्गत, NCDC के वित्तीय दायरे को विस्तारित करने के संदर्भ में कौन सा कथन सही है?
NCDC अब सहकारी समितियों को केवल प्रत्यक्ष रूप से ही सहायता दे सकता है।|NCDC प्रत्यक्ष सहायता के साथ-साथ मध्यवर्ती माध्यमों से भी सहायता दे सकता है।|NCDC अब केवल राज्य सरकारों के माध्यम से ही सहायता प्रदान कर सकता है।|NCDC सहकारी समितियों के लिए अब कोई वित्तीय सहायता प्रदान नहीं कर सकता है।
NCDC प्रत्यक्ष सहायता के साथ-साथ मध्यवर्ती माध्यमों से भी सहायता दे सकता है।
व्याख्या: संशोधन अधिनियम 2026 के अंतर्गत NCDC अब प्रत्यक्ष सहायता के साथ-साथ मध्यवर्ती माध्यमों से भी सहकारी समितियों को सहायता दे सकता है। पहले यह मुख्य रूप से राज्य सरकारों के माध्यम से ही सहायता प्रदान करता था। अब दोनों विकल्प उपलब्ध होने से सहकारी समितियों को अधिक सुगमता से वित्तीय सहायता मिल सकेगी।
भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद राज्य को सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने का निर्देश देता है?
अनुच्छेद 243|अनुच्छेद 43B|अनुच्छेद 32|अनुच्छेद 19(1)(c)
अनुच्छेद 43B
व्याख्या: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 43B राज्य को सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यप्रणाली, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने का निर्देश देता है। यह 97वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया नीति-निर्देशक सिद्धांत है जो सहकारी आंदोलन को मजबूत करने के लिए राज्य पर नैतिक बाध्यता डालता है।